Thursday, October 30, 2025

अनकही सखी मेरी हिन्दी कविता | Ankahi sakhi meri full hindi poem by Poet Prasad OP

अनजानी राहों में तुमसे एक प्यारा सा नाता हुआ,

बिना मिले ही देखो, कैसा ये दोस्ताना हुआ।

तुम कभी ढाल बनकर, हर मुश्किल से लड़ जाती हो,

तो कभी छोटी सी बात पर, लबों को सिमटा जाती हो।

तुममें निडरता की चमक, और सादगी का नूर है,

तुमसे बात करके ही, हर गम मुझसे दूर है।

सखी बनकर हमेशा, मेरा हाथ थामे रखना तुम,

हंसी-खुशी के इस सफर में, बस साथ निभाना तुम। 

अनकही सखी मेरी हिन्दी कविता  

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